‘मूर्ख’ - लोक करिबेक तोमार निन्दन ।
सहिते ना पारिमु सेइ ‘दुष्टे’र वचन ॥183॥
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अनुवाद
“मूर्ख लोग आपकी निन्दा करेंगे, परन्तु मैं ऐसे दुष्ट लोगों के शब्दों को सहन नहीं करूंगा।”
“Foolish people will criticize you, but I will not tolerate the words of such evil people.”
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि यद्यपि ब्राह्मण श्रेष्ठ समुदाय से सम्बन्ध नहीं रखता था, किन्तु उसने अभयपूर्वक तथाकथित जाति के ब्राह्मणों को दण्डित किया, क्योंकि वह शुद्ध भक्ति-भाव के पटल पर स्थित था। ऐसे लोग हैं जो श्री चैतन्य महाप्रभु के निम्न जाति से संबंधित किसी वैष्णव को स्वीकार करने का विरोध करते हैं। ऐसे लोग महाप्रसाद को पारलौकिक नहीं मानते हैं, और इसलिए उन्हें यहाँ मूर्ख (मूर्ख) और दुष्ट (दुष्ट) के रूप में वर्णित किया गया है। एक शुद्ध भक्त में ऐसे उच्च-जातीय लोगों को चुनौती देने की शक्ति होती है, और उनके बहादुरी भरे बयानों को घमंडी या घमंडी नहीं माना जाता है। इसके विपरीत, उन्हें सीधा-सादा माना जाना है। ऐसे व्यक्ति उच्च श्रेणी के ब्राह्मणों की चापलूसी करना पसंद नहीं करते हैं जो वैष्णव समुदाय से सम्बन्ध नहीं रखते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥