शब्द स्निग्ध ("बहुत शांतिपूर्ण") और सु-स्निग्ध ("स्नेही") क्रमशः चौदहवीं और पंद्रहवीं कविताओं में उपयोग किए गए हैं, और वे श्रीमद- भागवतम (१.१.८) में भी पाए जाते हैं: ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्यम अपि उता। "एक शिष्य जिसमें अपने आध्यात्मिक गुरु के लिए वास्तविक प्रेम होता है, आध्यात्मिक गुरु के आशीर्वाद से, सभी गोपनीय ज्ञान से संपन्न होता है।" श्रील श्रीधर स्वामी ने टिप्पणी की है कि स्निग्धस्य शब्द का अर्थ प्रेम-वत: है। प्रेम-वत: शब्द इंगित करता है कि किसी को अपने आध्यात्मिक गुरु से बहुत प्यार है।
