श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.17.14 
नूतन सङ्गी हइबेक, - स्निग्ध याँर मन ।
ऐछे यबे पाइ, तबे लइ ‘एक’ जन ॥14॥
 
 
अनुवाद
"ऐसा व्यक्ति अवश्य ही नया होगा, और उसका मन शांत होगा। अगर मुझे ऐसा कोई व्यक्ति मिल जाए, तो मैं उसे अपने साथ ले जाने को तैयार हूँ।"
 
"Such a person must be new. He must be calm. If I can find such a person, I am willing to take him with me."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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