"ब्रह्मभूता प्रसन्न आत्मा, ना शोचति ना कांक्षति। समः सर्वेषु भूतेषु, मद् भक्तिं लभते परम्।।
"इस प्रकार जो पारलौकिक रूप से स्थित होता है, वह परम ब्रह्म को तुरंत जान लेता है और पूर्ण आनंदित हो जाता है। वह न कभी दुखी होता है और न ही कुछ पाने की इच्छा करता है। वह हर जीव के प्रति समान रूप से व्यवहार करता है। उस स्थिति में वह मेरे प्रति विशुद्ध भक्ति प्राप्त करता है।"
जब कोई अध्यात्म रुप से जान लेता है (ब्रह्मभूता), तो वह प्रसन्न (प्रसन्न आत्मा) हो जाता है क्योंकि वह भौतिक अवधारणाओं से मुक्त हो जाता है। जिसने यह स्तर प्राप्त कर लिया है, वह भौतिक कर्म और प्रतिक्रिया से विचलित नहीं होता है। वह हर किसी को आत्मा (पंडिता: समदर्शिन:) के स्तर पर देखता है। जब कोई पूर्ण रूप से जान लेता है, तो वह विशुद्ध भक्ति के स्तर (मद्भक्तिं लभते परम्) तक उठ सकता है। जब कोई भक्ति, भक्तिमय सेवा के स्तर पर पहुँच जाता है, तो वह खुद-ब-खुद जान जाता है कि कृष्ण कौन हैं। जैसा कि भगवान भगवद गीता (18.55) में कहते हैं:
"भक्त्या मामभिजानाति, यावान यश्चास्मि तत्वतः। ततो माम तत्वतो ज्ञात्वा, विशते तदनन्तरम्।।"
"कोई भक्ति भाव से ही मुझे जान सकता है जैसे मैं हूँ, परम भगवान के रूप में। और जब वह ऐसी भक्ति से मेरी पूरी चेतना में हो जाता है, तो वह भगवान के राज्य में प्रवेश कर सकता है।"
केवल भक्ति के स्तर पर ही कोई परम भगवान कृष्ण और उनके परलौकिक नाम, रूप, गुण, लीलाओं और परिचारकों को जान सकता है। इस तरह आध्यात्मिक रूप से योग्य होने पर, उसे भगवान के आध्यात्मिक राज्य में प्रवेश करने और घर लौटने, वापस भगवान के पास जाने की अनुमति दी जाती है (विशते तदनंतरम्)।
