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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 132
 
 
श्लोक  2.17.132 
देह - देहीर, नाम - नामीर कृष्णे नाहि ‘भेद’ ।
जीवेर धर्म - नाम - देह - स्वरूपे ‘विभेद’ ॥132॥
 
 
अनुवाद
"कृष्ण के शरीर और स्वयं उनके बीच, या उनके नाम और स्वयं उनके बीच कोई अंतर नहीं है। लेकिन जहाँ तक बद्धजीव का संबंध है, उसका नाम उसके शरीर से, उसके मूल रूप से आदि से भिन्न है।
 
"There is no difference between Krishna's body and Krishna himself, or between his name and himself. But as far as the conditioned soul is concerned, his name is different from his body, his original form, and so on.
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु यहाँ ब्राह्मण को यह बता रहे हैं कि मायावादी दार्शनिक यह समझ नहीं सकते कि जीव की गुणवत्ता में ईश्वर के व्यक्तित्व के समानता है। क्योंकि वे इसे स्वीकार नहीं करते हैं, वे सोचते हैं कि माया से प्रभावित होने के कारण जीव का झूठे रूप में विभाजन हो गया है। मायावादी मानते हैं कि परम सत्य अन्ततः अवैयक्तिक है। जब भगवान का अवतार या स्वयं भगवान आते हैं, तो वे सोचते हैं कि वे माया से ढके हुए हैं। दूसरे शब्दों में, मायावादी अवैयक्तिकवादी सोचते हैं कि भगवान का रूप भी इस भौतिक जगत का ही एक उत्पाद है। ज्ञान की कमी के कारण, वे यह समझ नहीं सकते हैं कि कृष्ण का स्वयं से अलग कोई शरीर नहीं है। उनका शरीर और वे स्वयं दोनों ही परम सत्य है। कृष्ण का पूर्ण ज्ञान न होने के कारण, ऐसे अवैयक्तिकवादी निश्चित रूप से उनके चरणकमलों का अपमान करते हैं। इसलिए वे "कृष्ण" नहीं बोलते, जो कि परम सत्य का मूल नाम है। वे अपने अवैयक्तिक तरीके से, अवैयक्तिक ब्रह्मा, आत्मा नाम का उच्चारण करते हैं। दूसरे शब्दों में, वे परम सत्य के अप्रत्यक्ष संकेतों में लिप्त रहते हैं। भले ही वे "गोविंद," "कृष्ण" या "माधव" नामों का उच्चारण करते हों, फिर भी वे यह नहीं समझ सकते हैं कि ये नाम गोविंद, कृष्ण या माधव व्यक्ति के समान ही सच्चे हैं। क्योंकि वे अंततः अवैयक्तिकवादी हैं, व्यक्तिगत नाम का उनका उच्चारण शक्तिहीन है। वास्तव में वे कृष्ण में विश्वास नहीं करते हैं लेकिन इन सभी नामों को भौतिक स्पंदन मानते हैं। भगवान के पवित्र नाम की सराहना करने में असमर्थ, वे केवल ब्रह्मान, आत्मा और चैतन्य जैसे अप्रत्यक्ष नामों का उच्चारण करते हैं।

हालांकि, यह एक तथ्य है कि कृष्ण का नाम और कृष्ण व्यक्ति दोनों ही आध्यात्मिक हैं। कृष्ण से जुड़ी हर चीज पारलौकिक, आनंदमय और वस्तुगत है। एक बंधी हुई आत्मा के लिए, शरीर आत्मा से अलग है, और पिता द्वारा दिया गया नाम भी आत्मा से अलग है। भौतिक वस्तुओं के साथ बंधी हुई जीव की पहचान उसे उसकी वास्तविक स्थिति प्राप्त करने से रोकती है। हालांकि वह कृष्ण का एक शाश्वत सेवक है, वह अलग तरह से कार्य करता है। जीव की वास्तविक पहचान या स्वरूप का वर्णन श्री चैतन्य महाप्रभु ने 'जीवेर स्वरूप' हय - कृष्णेर 'नित्य-दास' के रूप में किया है। बंधी हुई आत्मा अपनी मूल स्थिति की वास्तविक गतिविधियों को भूल गई है। हालाँकि, कृष्ण के साथ ऐसा नहीं है। कृष्ण का नाम और उनकी पहचान एक ही है। माया कृष्ण जैसी कोई चीज नहीं है क्योंकि कृष्ण भौतिक सृष्टि का उत्पाद नहीं है। कृष्ण के शरीर और उनकी आत्मा में कोई अंतर नहीं है। कृष्ण एक साथ आत्मा और शरीर दोनों हैं। शरीर और आत्मा के बीच का अंतर बंधी हुई आत्माओं पर लागू होता है। बंधी हुई आत्मा का शरीर आत्मा से अलग है, और बंधी हुई आत्मा का नाम उसके शरीर से अलग है। किसी का नाम मिस्टर जॉन हो सकता है, लेकिन अगर हम मिस्टर जॉन को बुलाते हैं, तो मिस्टर जॉन वास्तव में कभी भी प्रकट नहीं हो सकते हैं। हालाँकि, अगर हम कृष्ण के पवित्र नाम का उच्चारण करते हैं, तो कृष्ण तुरंत हमारी जीभ पर प्रकट होते हैं। पद्म पुराण में, कृष्ण कहते हैं, मद-भक्ता यत्र गायंति तत्र तिष्ठामि नारद: "हे नारद, मैं जहाँ भी मेरे भक्त मेरा नाम जपते हैं, मैं वहाँ उपस्थित रहता हूँ।" जब भक्त कृष्ण के पवित्र नाम का उच्चारण करते हैं - हरि कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे - भगवान कृष्ण तुरंत उपस्थित हो जाते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)