हालांकि, यह एक तथ्य है कि कृष्ण का नाम और कृष्ण व्यक्ति दोनों ही आध्यात्मिक हैं। कृष्ण से जुड़ी हर चीज पारलौकिक, आनंदमय और वस्तुगत है। एक बंधी हुई आत्मा के लिए, शरीर आत्मा से अलग है, और पिता द्वारा दिया गया नाम भी आत्मा से अलग है। भौतिक वस्तुओं के साथ बंधी हुई जीव की पहचान उसे उसकी वास्तविक स्थिति प्राप्त करने से रोकती है। हालांकि वह कृष्ण का एक शाश्वत सेवक है, वह अलग तरह से कार्य करता है। जीव की वास्तविक पहचान या स्वरूप का वर्णन श्री चैतन्य महाप्रभु ने 'जीवेर स्वरूप' हय - कृष्णेर 'नित्य-दास' के रूप में किया है। बंधी हुई आत्मा अपनी मूल स्थिति की वास्तविक गतिविधियों को भूल गई है। हालाँकि, कृष्ण के साथ ऐसा नहीं है। कृष्ण का नाम और उनकी पहचान एक ही है। माया कृष्ण जैसी कोई चीज नहीं है क्योंकि कृष्ण भौतिक सृष्टि का उत्पाद नहीं है। कृष्ण के शरीर और उनकी आत्मा में कोई अंतर नहीं है। कृष्ण एक साथ आत्मा और शरीर दोनों हैं। शरीर और आत्मा के बीच का अंतर बंधी हुई आत्माओं पर लागू होता है। बंधी हुई आत्मा का शरीर आत्मा से अलग है, और बंधी हुई आत्मा का नाम उसके शरीर से अलग है। किसी का नाम मिस्टर जॉन हो सकता है, लेकिन अगर हम मिस्टर जॉन को बुलाते हैं, तो मिस्टर जॉन वास्तव में कभी भी प्रकट नहीं हो सकते हैं। हालाँकि, अगर हम कृष्ण के पवित्र नाम का उच्चारण करते हैं, तो कृष्ण तुरंत हमारी जीभ पर प्रकट होते हैं। पद्म पुराण में, कृष्ण कहते हैं, मद-भक्ता यत्र गायंति तत्र तिष्ठामि नारद: "हे नारद, मैं जहाँ भी मेरे भक्त मेरा नाम जपते हैं, मैं वहाँ उपस्थित रहता हूँ।" जब भक्त कृष्ण के पवित्र नाम का उच्चारण करते हैं - हरि कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे - भगवान कृष्ण तुरंत उपस्थित हो जाते हैं।
