श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 130
 
 
श्लोक  2.17.130 
अतएव तार मुखे ना आइसे कृष्ण - नाम ।
‘कृष्ण - नाम’, ‘कृष्ण - स्वरूप’ - दुइत ‘समान’ ॥130॥
 
 
अनुवाद
"क्योंकि वे भगवान कृष्ण के अपराधी हैं, जो उनके पवित्र नाम के समान हैं, इसलिए पवित्र नाम 'कृष्ण' उनके मुख से प्रकट नहीं होता।
 
The holy name of "Krishna" does not come to their lips, because they are offenders towards Lord Krishna, who is one with His name.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)