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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 121
 
 
श्लोक  2.17.121 
‘वेदान्त’ श्रवण कर, ना याइह ताँर पाश ।
उच्छृङ्खल - लोक - सङ्गे दुइ - लोक - नाश” ॥121॥
 
 
अनुवाद
"चैतन्य के दर्शन करने मत जाओ। बस वेदांत सुनते रहो। अगर तुम नए लोगों के साथ संगति करोगे, तो इस लोक में और परलोक में भी भटक जाओगे।"
 
"Don't go to meet Chaitanya. Keep listening to Vedanta. If you associate with such unruly people, you will be ruined in this world and the next."
तात्पर्य
इस श्लोक में "उच्छ्रंखल" शब्द जो कि "ठिठोल" या "स्वच्छंद" होने का अर्थ देता है, महत्वपूर्ण है। भगवद गीता (16.23) में, स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:

यः शास्त्रविधिम उत्सृज्य वर्तते कामकारतः

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्।।

"जो शास्त्रीय सिद्धांतों को त्याग कर स्वच्छंद हो जाता है, वह कभी भी पूर्णता, खुशी या आध्यात्मिक दुनिया प्राप्त नहीं करेगा|

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)