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श्लोक 2.17.111  |
‘निरन्तर कृष्ण - नाम’ जिह्वा ताँर गाय ।
दुइ - नेत्रे अश्रु वहे गङ्गा - धारा - प्राय ॥111॥ |
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| अनुवाद |
| “उनकी जिह्वा सदैव कृष्ण के पवित्र नाम का जप करती रहती है, और उनकी आँखों से बहती गंगा की तरह निरंतर आँसू गिरते रहते हैं। |
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| “His tongue continually chants the holy name of Krishna and tears flow from his eyes like the stream of the Ganges. |
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