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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 17: महाप्रभु की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 103
 
 
श्लोक  2.17.103 
एइ - मत प्रति - दिन करेन वञ्चन ।
सन्न्यासी र सङ्ग - भये ना मानेन निमन्त्रण ॥103॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु प्रतिदिन उनके निमंत्रण अस्वीकार कर देते थे, क्योंकि उन्हें मायावादी संन्यासियों के साथ संगति करने में भय लगता था।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu used to refuse people's invitations every day because he was afraid of the company of Mayavadi sannyasis.
तात्पर्य
एक वैष्णव संन्यासी कभी भी उस समूह से निमंत्रण स्वीकार नहीं करता जो मायावादी संन्यासियों और वैष्णव संन्यासियों को एक ही व्यक्ति मानता है। दूसरे शब्दों में कहें तो, वैष्णव संन्यासियों को मायावादी संन्यासियों के साथ घुलना-मिलना बिल्कुल भी पसंद नहीं है, उनके साथ खाना तो दूर की बात है। कृष्ण भावना आंदोलन के संन्यासियों को इस सिद्धांत का पालन करना चाहिए। यह श्री चैतन्य महाप्रभु की शिक्षा है, जो उन्होंने अपने व्यक्तिगत व्यवहार से दी थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)