गदाधर - पण्डिते तेंहो पुनः मन्त्र दिल ।
ओड़न - षष्ठीर दिने यात्रा ये देखिल ॥78॥
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अनुवाद
पुण्डरीक विद्यानिधि ने गदाधर पंडित को दूसरी बार दीक्षा दी, और ओडना-षष्ठी के दिन पुण्डरीक विद्यानिधि ने उत्सव देखा।
Pundarik Vidyanidhi re-initiated Gadadhara Pandita and witnessed the celebrations on the day of Odanasashti.
तात्पर्य
हिमकाल के प्रारंभ होने पर ओडान-षष्ठी नाम से एक उत्सव होता है। इस उत्सव से सूचित होता है कि उस दिन से भगवान जगतनाथ को शीतकालीन आवरण देना चाहिए। उस आवरण को सीधा बुनकर से खरीदा जाता है। अर्चना-मार्ग के अनुसार, सर्वप्रथम कपड़े को धोया जाना चाहिए ताकि उसका सारा स्टार्च निकल जाए, फिर उसे भगवान को ढंकने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। पुण्डरीक विद्यानिधि ने देखा कि पुजारी ने भगवान जगन्नाथ को ढंकने से पहले कपड़े को धोया नहीं था। चूँकि वह भक्तों में कुछ कमी निकालना चाहता था, वह क्रोधित हो गया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥