Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 72
 
 
श्लोक  2.16.72 
“कृष्ण - नाम निरन्तर याँहार वदने ।
सेइ वैष्णव - श्रेष्ठ, भज ताँहार चरणे ॥72॥
 
 
अनुवाद
“जो व्यक्ति सदैव भगवान के पवित्र नाम का जप करता रहता है, उसे प्रथम श्रेणी का वैष्णव माना जाना चाहिए, और तुम्हारा कर्तव्य उसके चरणकमलों की सेवा करना है।”
 
“A person who always chants the holy name of the Lord should be considered a Vaishnava of the highest order, and it is your duty to serve his lotus feet.”
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि कोई भी वैष्णव जो निरंतर भगवान के पवित्र नाम का जाप करता है उसे वैष्णवता के दूसरे प्लेटफॉर्म को प्राप्त किया हुआ माना जाना चाहिए। ऐसा भक्त एक नौसिखिया वैष्णव से श्रेष्ठ होता है जिसने अभी-अभी भगवान के पवित्र नाम का जाप करना सीखा हो। एक नौसिखिया भक्त बस पवित्र नाम का जाप करने की कोशिश करता है जबकि एक उन्नत भक्त जाप करने का अभ्यस्त हो जाता है और उसमें आनंद लेता है। ऐसे उन्नत भक्त को एक मध्यमा-भागवत कहा जाता है जो यह दर्शाता है कि उसने नौसिखिया और परिपूर्ण भक्त के बीच की मध्यवर्ती स्थिति प्राप्त कर ली है। आम तौर पर मध्यवर्ती स्थिति के एक भक्त एक उपदेशक बन जाते हैं। एक नौसिखिया भक्त या एक साधारण व्यक्ति को मध्यमा-भागवत की पूजा करनी चाहिए जो कि व्यावहारिक माध्यम है।

अपने उपदेशामृत (5) में श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं, प्रणतिभिश्च भजन्तम ईशम्। इसका मतलब यह है कि मध्यमा-अधिकारी भक्तों को आपस में प्रणाम-विनिमय करना चाहिए।

इस श्लोक में "अविराम, लगातार, निरंतर" का अर्थ वाले शब्द निरंतर बहुत महत्वपूर्ण है। अंतर शब्द का अर्थ "अंतराल" है। यदि किसी की भक्ति सेवा करने की इच्छा के अलावा अन्य इच्छाएं हैं - दूसरे शब्दों में, यदि कोई कभी-कभी भक्ति सेवा में संलग्न होता है और कभी-कभी इंद्रिय तृप्ति के लिए प्रयास करता है - तो उसकी सेवा बाधित हो जाएगी। इसलिए, एक शुद्ध भक्त को कृष्ण की सेवा करने के अलावा कोई अन्य इच्छा नहीं होनी चाहिए। उसे फलदायी गतिविधि और सैद्धांतिक ज्ञान से ऊपर होना चाहिए। अपने भक्ति-रसामृत-सिंधु (1.1.11) में, श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं:

अन्याभिलाषिता-शून्यं ज्ञान-कर्माद्य-अनावृतं

आनुकूल्येन कृष्णाను-शीलनं भक्ति रुतमा

यह शुद्ध भक्ति सेवा का प्लेटफार्म है। किसी को भी फलदायी गतिविधि या मानसिक अटकलों से प्रेरित नहीं होना चाहिए, बल्कि कृष्ण की बस अनुकूल सेवा करनी चाहिए। यह प्रथम श्रेणी की भक्ति है।

अंतर का दूसरा अर्थ "यह शरीर" है। शरीर आत्म-साक्षात्कार में बाधा है क्योंकि यह हमेशा इंद्रिय तृप्ति में लगा रहता है। इसी तरह, अंतर का अर्थ "धन" है। अगर धन को कृष्ण की सेवा में उपयोग नहीं किया जाता है तो यह भी एक बाधा है। अंतर का अर्थ जनता भी होता है"। सामान्य लोगों का संग भक्ति सेवा के सिद्धांतों को नष्ट कर सकता है। इसी तरह, अंतर का अर्थ "लालची" हो सकता है - अधिक धन प्राप्त करने या अधिक इंद्रिय तृप्ति का आनंद लेने की लालची। अंत में, अंतर शब्द का अर्थ "नास्तिक विचार" भी हो सकता है जिससे मंदिर की देवता को पत्थर, लकड़ी या सोना माना जाता है। ये सभी बाधाएँ हैं। मंदिर में देवता भौतिक नहीं है - वह स्वयं भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं। इसी तरह, आध्यात्मिक गुरु को एक साधारण इंसान (गुरुषु नर-मतिः) मानना भी एक बाधा है। न ही किसी वैष्णव को एक विशेष जाति या राष्ट्र का सदस्य माना जाना चाहिए। न ही एक वैष्णव को भौतिक माना जाना चाहिए। चरणामृत को साधारण पेयजल नहीं माना जाना चाहिए, और प्रभु के पवित्र नाम को एक साधारण ध्वनि कंपन नहीं माना जाना चाहिए। न ही किसी को भगवान कृष्ण को एक साधारण इंसान की तरह देखना चाहिए, क्योंकि वह सभी विष्णु-तत्वों की उत्पत्ति है।, न ही किसी को सर्वोच्च भगवान को एक देवता के रूप में मानना चाहिए। आध्यात्मिक को भौतिक के साथ जोड़ने से व्यक्ति को भौतिक रूप से उत्कृष्टता और सांसारिक रूप से आध्यात्मिक रूप में देखने लग जाते हैं। यह सब ज्ञान की कमी के कारण है। व्यक्ति को भगवान विष्णु और उनसे संबंधित चीजों को अलग नहीं मानना चाहिए। यह सब अपमानजनक है।

भक्ति-संदर्भ (265) में, श्रील जीव गोस्वामी लिखते हैं: नामैकं यस्य वाची स्मरण-पथ-गतम इत्य-आदौ देह-द्रविणा-दि-निमित्तका-'पाषंड'-शब्देन च दश अपराधा लक्ष्यन्ते, पाषंड-मयत्वात तेषाम्। "नामैकं यस्य से शुरू होने वाले श्लोक में, हम पाषंड ('ईश्वरहीनता') शब्द पाते हैं। यह शब्द सचमुच किसी के शरीर या संपत्ति के दुरुपयोग को दर्शाता है, लेकिन उस श्लोक में इसका अर्थ भगवान के पवित्र नाम के खिलाफ दस अपराध हैं, क्योंकि इनमें से प्रत्येक ऐसे ईश्वरीय व्यवहार की ओर जाता है।

मायावादी अपने ज्ञान की कमी के कारण विष्णु और वैष्णवों को अपूर्ण रूप से देखते हैं, और इसकी निंदा की जाती है। श्रीमद-भागवतम (11.2.46) में, मध्यवर्ती वैष्णव को इस प्रकार वर्णित किया गया है:

ईश्वरे तदधीनेषु बालीशेषु द्विषत्सु च

प्रेम-मैत्री-कृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः

"मध्यम वैष्णव को ईश्वर से प्रेम करना होता है, भक्तों से मित्रता करनी होती है, निष्कलंक को निर्देश देना होता है और ईर्ष्यालु लोगों को अस्वीकार करना होता है।" ये मध्यम स्तर के वैष्णव के चार कार्य हैं। चैतन्य-चरितामृत (मध्य 22.64) में श्री सनातन गोस्वामी को सिखाया गया है:

श्रद्धावान जन हय भक्ति-अधिकारी

"उत्तम", "मध्यम", "कनिष्ठ" श्रद्धानुसारी

"जो श्रद्धावान होता है, वह भक्ति सेवा के लिए उचित उम्मीदवार होता है। भक्ति सेवा में उसके विश्वास की डिग्री के आधार पर, व्यक्ति प्रथम-श्रेणी, द्वितीय-श्रेणी या नवोदित वैष्णव होता है।"

शास्त्र-युक्ति नहि जाने दृढ़, श्रद्धावान

"मध्यम-अधिकारी" सेइ महाभाग्यवान

"जो मध्यम स्तर पर पहुँच गया है, वह शास्त्रीय ज्ञान में बहुत उन्नत नहीं होता है, लेकिन उसका प्रभु में दृढ़ विश्वास होता है। ऐसा व्यक्ति मध्यम स्तर पर स्थित होने का बहुत भाग्यशाली होता है।" (चैतन्य चरितामृत मध्य 22.67)

रति-प्रेम-तारतम्ये भक्तातरतम

"परमात्मा के प्रति आकर्षण और प्रेम भक्ति सेवा का अंतिम लक्ष्य है। ऐसे आकर्षण और प्रेम की डिग्री भक्ति के विभिन्न चरणों को अलग करती है - नवोदित, मध्यम और पूर्ण।" (चैतन्य चरितामृत मध्य 22.71) एक मध्यम भक्त का पवित्र नाम जपने के प्रति बहुत आकर्षण होता है, और जपने से वह प्रेम के मंच पर ऊपर उठ जाता है। यदि कोई प्रभु के पवित्र नाम का बहुत लगाव से जप करता है, तो वह आध्यात्मिक गुरु, अन्य वैष्णवों और स्वयं कृष्ण के शाश्वत सेवक के रूप में अपनी स्थिति को समझ सकता है। इस प्रकार मध्यम वैष्णव खुद को कृष्ण-दास, कृष्ण का सेवक मानता है। इसलिए वह निर्दोष नवोदितों को कृष्ण चेतना का प्रचार करता है और हरे कृष्ण महामंत्र के जप के महत्व पर बल देता है। एक मध्यम भक्त गैर-भक्त या प्रेरित भक्त को पहचान सकता है। प्रेरित भक्त या गैर-भक्त भौतिक मंच पर होते हैं, और उन्हें प्राकृत कहा जाता है। मध्यम भक्त ऐसे भौतिकवादी लोगों के साथ मेलजोल नहीं रखता है। हालाँकि, वह समझता है कि भगवान श्री हरि और उनसे जुड़ी हर चीज एक ही पारलौकिक मंच पर है। वास्तव में उनमें से कोई भी सांसारिक नहीं है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)