श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  2.16.66 
नित्यानन्द कहे , - आमि ‘देह’ तुमि ‘प्राण’ ।
‘देह’ ‘प्राण” भिन्न नहे , - एइ त प्रमाण ॥66॥
 
 
अनुवाद
नित्यानंद प्रभु ने उत्तर दिया, "हे प्रभु, आप जीवन हैं और मैं शरीर हूँ। शरीर और जीवन में कोई अंतर नहीं है, लेकिन जीवन शरीर से ज़्यादा महत्वपूर्ण है।"
 
Nityananda Prabhu replied, "O Lord, you are the soul and I am the body. There is no difference between the soul and the body. Rather, the soul is greater than the body."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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