“अमार दुष्कर कर्म तोमा हइते हाये।“
जगई और माधई को केवल नित्यानंद प्रभु की कृपा से मुक्ति मिली थी। जब उन्होंने नित्यानंद प्रभु को घायल किया तो प्रभु चैतन्य बहुत क्रोधित हुए और अपने सुदर्शन चक्र से उन्हें मारने का निश्चय किया, पर नित्यानंद प्रभु ने उन्हें प्रभु के कोप से बचाया और उन्हें मुक्ति दिलाई। गौर-नितई के अवतार में प्रभु को राक्षसों को मारने के लिए नहीं बल्कि कृष्ण भक्ति का प्रचार करके उन्हें मुक्ति दिलाने के लिए जाना जाता है। जगई और माधई के मामले में श्री चैतन्य महाप्रभु इतने क्रोधित हो गए थे कि वे उसी समय उन्हें मार सकते थे, पर नित्यानंद प्रभु इतने दयालु थे कि उन्होंने न केवल उन्हें मृत्यु से बचाया बल्कि उन्हें दिव्य पद पर भी बिठाया। जो काम श्री चैतन्य महाप्रभु नहीं कर पाए वो काम नित्यानंद प्रभु ने किया।
इसी प्रकार, अगर कोई गौर-नितई की सेवा में शिष्य परंपरा में निष्ठावान है तो वह नित्यानंद प्रभु की सेवा को भी पार कर सकता है। यही शिष्य परंपरा की प्रक्रिया है। नित्यानंद प्रभु ने जगई और माधई को मुक्ति दिलाई, पर नित्यानंद प्रभु के किसी सेवक ने, उनकी कृपा से, जगई और माधई जैसे बहुत से हजारों लोगों को मुक्ति दिलाई। यही शिष्य परंपरा की विशेष कृपा है। कोई शिष्य परंपरा में निष्ठावान है या नहीं ये उसके कार्यों के नतीजों से पता चल जाता है। यह बात प्रभु और उनके भक्तों के कार्यों पर हमेशा सही बैठती है। इसीलिए भगवान शिव कहते हैं:
“आरधनानां सर्वेषां विष्णोराराधनं परम। तस्मात्परतरं देवि तदीयनाम समर्चनम्।”
“सभी प्रकार की पूजा में विष्णु जी की पूजा सबसे श्रेष्ठ है, और विष्णु जी की पूजा से भी श्रेष्ठ उनके भक्त, वैष्णवों, की पूजा है।“ (पद्म पुराण)
विष्णु जी की कृपा से एक वैष्णव विष्णु जी से भी बेहतर सेवा कर सकता है; यही एक वैष्णव का विशेष अधिकार है। प्रभु वास्तव में अपने सेवकों को खुद से भी अधिक गौरवशाली कार्य करते हुए देखना चाहते हैं। जैसे कि, कुरूक्षेत्र में श्री कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध लड़ने के लिए प्रेरित किया, क्योंकि कृष्ण की योजना के अनुसार युद्ध में सभी योद्धाओं को मरना था। कृष्ण खुद उसका श्रेय नहीं लेना चाहते थे, बल्कि वे चाहते थे कि वह श्रेय अर्जुन को मिले। इसीलिए उन्होंने अर्जुन से युद्ध लड़ने और यश प्राप्त करने को कहा:
“तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व। जित्वा शत्रूनभुंक्ष्व राज्यं समृद्धम्। मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन।”
“इसलिए उठो। युद्ध लड़ने के लिए तैयार हो जाओ और यश प्राप्त करो। अपने शत्रुओं को जीतकर अपने समृद्ध राज्य का भोग करो। वे सब पहले से ही मेरे प्रबंध से मारे जा चुके हैं और तुम, हे सव्यसाची, युद्ध में केवल एक निमित्त मात्र बनो।“ (भगवद गीता 11.33)
ऐसे में भगवान सर्वशक्तिमान उस भक्त को श्रेय देते हैं जो कोई भी कठिन कार्य पूर्णता से करता है। हनुमान जी या वज्रांग जी, प्रभु रामचंद्र के सेवक, एक और ऐसा ही उदाहरण हैं। हनुमान जी ने ही एक छलांग में समुद्र पार किया और भारतवर्ष के किनारे से लंका के किनारे पर पहुँचे। जब प्रभु रामचंद्र ने वहाँ जाने का फैसला किया तो उन्होंने पत्थरों का रास्ता बनाया, पर उनकी इच्छा से वे पत्थर समुद्र पर तैर रहे थे। अगर हम श्री चैतन्य महाप्रभु के निर्देशों का पालन करें और श्री नित्यानंद प्रभु के पद चिन्हों पर चलें तो प्रभु की सेवा में विश्वास पूर्वक लगे रहने वाले प्रचारकों द्वारा कृष्ण भक्ति आंदोलन का विकास किया जा सकता है, और इससे भी कठिन कार्य भी किए जा सकते हैं।
