श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  2.16.45 
वाणीनाथ, काशी - मिश्र प्रसाद आनिल ।
स्वहस्ते सबारे प्रभु प्रसाद खाओयाइल ॥45॥
 
 
अनुवाद
तब वाणीनाथ राय और काशी मिश्र बड़ी मात्रा में प्रसाद लाए और श्री चैतन्य महाप्रभु ने उसे अपने हाथों से वितरित किया और सभी को खिलाया।
 
Then Vaninath Rai and Kashi Mishra brought a large quantity of Prasad and Sri Chaitanya Mahaprabhu distributed and fed that Prasad to everyone with his own hands.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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