सेइ कथा सबार मध्ये कहे नित्यानन्द ।
शुनिया वैष्णव - मने बाड़िल आनन्द ॥34॥
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अनुवाद
भगवान नित्यानंद ने पुनः यही कथा सभी भक्तों को सुनाई और कथा सुनकर उनका दिव्य आनंद बढ़ गया।
Lord Nityananda retold this same story to all the devotees. Hearing it again increased the devotees' transcendental joy.
तात्पर्य
महाप्रभु मुखे शब्द, "श्री चैतन्य महाप्रभु के मुँह से", विशेषता है क्योंकि श्री चैतन्य महाप्रभु ने सबसे पहले माधवेंद्र पुरी की कहानी उनके आध्यात्मिक गुरु श्रीपाद ईश्वर पुरी से सुनी थी। (देखें मध्य-लीला, अध्याय चार, पद 18.) शांतिपुर में श्री अद्वैत के घर पर कुछ समय तक रहने के बाद, भगवान ने माधवेंद्र पुरी की कहानी नित्यानंद प्रभु, जगदानंद प्रभु, दामोदर पंडित और मुकुंद दास को सुनाई। जब वे रेमुना, गोपीनाथ के मंदिर गए, तो उन्होंने माधवेंद्र पुरी द्वारा गोपाल देवता की स्थापना और गोपीनाथ द्वारा गाढ़ा दूध चुराने का वर्णन किया। इस घटना के कारण, भगवान गोपीनाथ को क्षीरचोरा, गाढ़ा दूध चोरी करने वाले चोर के रूप में जाना जाने लगा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥