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श्लोक 2.16.289  |
सहस्र - वदने कहे आपने ‘अनन्त’ ।
तबु एक लीलार तेंहो नाहि पाय अन्त ॥289॥ |
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| अनुवाद |
| यद्यपि भगवान अनन्तदेव अपने हजारों मुखों से भगवान की लीलाओं का वर्णन करते रहते हैं, किन्तु वे भगवान की एक भी लीला के अंत तक नहीं पहुँच पाते। |
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| Although Anantadeva always describes the pastimes of the Lord with his thousand mouths, he cannot explain even one pastime. |
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