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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 263-264
 
 
श्लोक  2.16.263-264 
ताँर दैन्य देखि’ शुनि’ पाषाण विदरे ।
आमि तुष्ट हञा तबे कहि लुँ दोंहारे ॥263॥
“उत्तम ह ञा हीन क रि’ मानह आपनारे ।
अचिरे करिबे कृष्ण तोमार उद्धारे” ॥264॥
 
 
अनुवाद
"वास्तव में, इन दोनों भाइयों की विनम्रता पत्थर को भी पिघला सकती थी। चूँकि मैं उनके व्यवहार से बहुत प्रसन्न था, इसलिए मैंने उनसे कहा, 'यद्यपि तुम दोनों बहुत ऊँचे हो, फिर भी अपने आप को हीन समझते हो, और इसीलिए कृष्ण शीघ्र ही तुम्हारा उद्धार करेंगे।'
 
"Surely, the humility of these two brothers could melt even a stone. Pleased with their conduct, I said to them, 'Although you both are of high class, you consider yourselves lowly; therefore, Krishna will soon deliver you both.'
तात्पर्य
ऐसे होते हैं एक शुद्ध भक्त के लक्षण। भौतिक रूप से कोई बहुत ही संपन्न, अनुभवी, प्रभावशाली और शिक्षित हो सकता है, लेकिन अगर वह अभी भी खुद को सड़क के पुआल से नीचे मानता है, तो वह श्री चैतन्य महाप्रभु या भगवान कृष्ण का ध्यान आकर्षित करता है। हालाँकि महाराजा प्रतापरुद्र एक राजा थे, उन्होंने भगवान जगन्नाथ के रथ (रथ) के लिए रास्ता साफ करने के लिए झाड़ू उठाया। इस विनम्र सेवा के कारण, श्री चैतन्य महाप्रभु राजा से बहुत प्रसन्न थे, और इसी कारण प्रभु ने उन्हें गले लगाया। श्री चैतन्य महाप्रभु के निर्देशों के अनुसार, एक भक्त को कभी भी भौतिक शक्ति का घमंड नहीं करना चाहिए। उसे पता होना चाहिए कि भौतिक शक्ति किसी के पिछले अच्छे कार्यों (कर्म) का परिणाम है और परिणामस्वरूप क्षणभंगुर है। किसी भी क्षण किसी के सभी भौतिक वैभव को समाप्त किया जा सकता है; इसलिए एक भक्त को ऐसे वैभव पर कभी गर्व नहीं करना चाहिए। वह हमेशा विनम्र और नम्र रहता है, खुद को तिनके के टुकड़े से भी नीचा मानता है। इस कारण से, भक्त भगवद् को वापस घर लौटने के पात्र हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)