श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 258
 
 
श्लोक  2.16.258 
लक्ष लक्ष लोक आइसे कौतुक देखिते ।
लोकेर सङ्गट्टे पथ ना पारि चलिते ॥258॥
 
 
अनुवाद
“कई लाख लोग जिज्ञासावश मुझे देखने आये, और इतनी बड़ी भीड़ के कारण मैं सड़क पर बहुत आसानी से यात्रा नहीं कर सका।
 
“Millions of people came out of curiosity to see me and there was such a crowd that it became difficult to walk freely on the road.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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