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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 238
 
 
श्लोक  2.16.238 
मकर् ट - वैराग्य ना कर लोक देखा ञा ।
यथा - योग्य विषय भुञ्ज’ अनासक्त ह ञा ॥238॥
 
 
अनुवाद
"तुम्हें दिखावटी भक्त नहीं बनाना चाहिए और न ही मिथ्या संन्यासी बनना चाहिए। फिलहाल, भौतिक संसार का उचित ढंग से आनंद लो और उसमें आसक्त मत होओ।"
 
"Do not become a superficial devotee or a false ascetic. For now, enjoy the material world in the appropriate manner, but do not become attached to it."
तात्पर्य
इस श्लोक में अर्थहीन त्याग को इंगित करने वाले शब्द मार्कट-वैराग्य का बड़ा महत्व है। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर इस शब्द की टीका करते हुए इंगित करते हैं कि बंदर कपड़े न पहनकर और जंगल में नंगे रहकर त्याग का बाहरी प्रदर्शन करते हैं। इस प्रकार वे अपने आप को त्यागी मानते हैं, पर वास्तव में वे कई मादा बंदरों के साथ भोग विलास में खोए रहते हैं। इस तरह के त्याग को मार्कट वैराग्य - यानी बंदरों का त्याग - कहा जाता है। वास्तविक रूप से त्यागी बनने के लिए हमें भौतिक गतिविधि से वास्तविक घृणा करनी होगी और उसे आध्यात्मिक उन्नति की राह में बाधा के रूप में देखना होगा। त्याग कभी भी फल्गु यानी अस्थायी नहीं होना चाहिए, बल्कि जीवन भर रहना चाहिए। अस्थायी त्याग अथवा बंदरों वाला त्याग, श्मशान में महसूस होने वाले त्याग की तरह होता है। जब कोई व्यक्ति किसी मृत शरीर को श्मशान ले जाता है, तो कभी-कभी वह सोचता है, "यह शरीर का अंतिम अंत है। मैं दिन-रात इतनी मेहनत क्यों कर रहा हूँ?" इस तरह की भावना स्वाभाविक ही किसी भी मनुष्य के मन में उठती है जो श्मशान घाट जाता है। हालाँकि, जैसे ही वह श्मशान घाट से लौटता है, वह फिर से भोग विलास के लिए भौतिक गतिविधि में लिप्त हो जाता है। इसे श्मशान-वैराग्य या मार्कट-वैराग्य कहा जाता है। भगवान की सेवा करने के लिए, व्यक्ति आवश्यक चीजों को स्वीकार कर सकता है। यदि कोई इस तरह रहता है, तो वह वास्तव में त्यागी बन सकता है। भक्ति-रसामृत-सिंधु (1.2.108) में कहा गया है:

यावता स्यात् स्व-निर्वाहो स्वी-कुर्यात् तावद अर्थ-वित

आधिक्ये न्यूनतायां च च्यवते परमार्थतः

"जीवन की नंगी ज़रूरतों को स्वीकार किया जाना चाहिए, लेकिन व्यक्ति को अपनी ज़रूरतों को ज़रूरत से ज़्यादा नहीं बढ़ाना चाहिए। अनावश्यक रूप से भी उन्हें कम नहीं किया जाना चाहिए। किसी को केवल वही स्वीकार करना चाहिए जो आध्यात्मिक रूप से आगे बढ़ने में मदद करे।"

अपने दुर्गामा-संगमनी में, श्री जीवा गोस्वामी कहते हैं कि स्व-निर्वाहो का अर्थ वास्तव में स्व-स्व-भक्ति-निर्वाहो है। अनुभवी भक्त केवल उन भौतिक चीजों को स्वीकार करेगा जो उसे भगवान की सेवा करने में मदद करेंगी। भक्ति-रसामृत-सिंधु (1.2.256) में, मार्कट-वैराग्य या फल्गु-वैराग्य को निम्न प्रकार से समझाया गया है:

प्रापंञ्चिकतया बुद्ध्या हरि-संबंधि-वस्तुनाः

मुमुक्षुभिः परित्यागो वैराग्यं फल्गु कथ्यते

"जब लोग मुक्ति पाने के उत्सुक, भगवान के संबंध से संबंधित चीजों को भौतिक समझकर त्याग देते हैं, तो उनके त्याग को अधूरा कहा जाता है।" भगवान की सेवा को अनुकूल जो कुछ भी है उसे स्वीकार किया जाना चाहिए और भौतिक वस्तु के रूप में उसे नकारा नहीं जाना चाहिए। युक्त वैराग्य या उचित त्याग को इस प्रकार समझाया गया है:

अनासक्तस्य विषयान यथार्हं उपयुंजत

निर्बंधः कृष्ण-संबंधे युक्तं वैराग्यं उच्यते

"किसी को भी भगवान की सेवा के लिए स्वीकार किया जाना चाहिए, न कि व्यक्तिगत भोग विलास के लिए। यदि कोई बिना आसक्ति के कुछ स्वीकार करता है और इसे इसलिए स्वीकार करता है क्योंकि यह कृष्ण से संबंधित है, तो उसके त्याग को युक्त-वैराग्य कहा जाता है।" चूँकि कृष्ण परम सत्य हैं, इसलिए उनकी सेवा के लिए जो कुछ भी स्वीकार किया जाता है वह भी परम सत्य है। भगवान चैतन्य महाप्रभु द्वारा श्रील रूप गोस्वामी की नकल करने की कोशिश में कमरबंद पहने तथाकथित वैष्णवों को इंगित करने के लिए मार्कट-वैराग्य शब्द का उपयोग किया जाता है। ऐसे लोग एक मोतियों का थैला लेकर जप करते हैं, लेकिन मन में वे हमेशा महिलाओं और धन प्राप्त करने के बारे में सोचते रहते हैं। अन्य लोगों को पता नहीं होता, पर ये मार्कट-वैरागी महिलाओं को रखते हैं, लेकिन बाहरी तौर पर खुद को त्यागी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु इन मार्कट-वैरागियों या छद्म वैष्णवों का बहुत विरोध करते थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)