श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 232
 
 
श्लोक  2.16.232 
“आज्ञा देह’, याञा देखि प्रभुर चरण ।
अन्यथा, ना रहे मोर शरीरे जीवन” ॥232॥
 
 
अनुवाद
रघुनाथदास ने अपने पिता से प्रार्थना की, "कृपया मुझे भगवान के चरणकमलों के दर्शन करने की अनुमति दीजिए। यदि आप ऐसा नहीं करेंगे, तो मेरा प्राण इस शरीर में नहीं रहेगा।"
 
Raghunatha Dasa asked his father, "Please allow me to see the lotus feet of Mahaprabhu. If you do not do so, my soul will not be able to remain in this body."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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