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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 217
 
 
श्लोक  2.16.217 
‘हिरण्य’, ‘गोवर्धन’, - दुइ सहोदर ।
सप्तग्रामे बार - लक्ष मुद्रार ईश्वर ॥217॥
 
 
अनुवाद
हिरण्य और गोवर्धन नाम के दो भाई, जो सप्तग्राम के निवासी थे, की वार्षिक आय 1,200,000 रुपये थी।
 
The annual income of two brothers named Hiranya and Govardhan, residents of Saptagram, was twelve lakh rupees.
तात्पर्य
हिराण्य और गोवर्धन हुगली जिले के सप्तग्राम के निवासी थे। वास्तव में, वे सप्तग्राम के निवासी नहीं थे, बल्कि कृष्णापुर नामक एक निकटवर्ती गाँव के निवासी थे। वे एक बड़े कायस्थ परिवार में पैदा हुए थे, और यद्यपि उनके परिवार की उपाधि का पता नहीं चल पाया है, यह ज्ञात है कि वे एक कुलीन परिवार से आते थे। बड़े भाई का नाम हिराण्य मजुमदार था और छोटे भाई का नाम गोवर्धन मजुमदार था। श्री रघुनाथ दास गोवर्धन मजुमदार के पुत्र थे। उनके परिवार के पुजारी बलराम आचार्य थे, जो हरिदास ठाकुर के प्रिय थे, और परिवार के आध्यात्मिक गुरु यदुनंदन आचार्य थे, जो वासुदेव दत्त के प्रिय थे।

सप्तग्राम गाँव कलकत्ता से बर्दवान के लिए पूर्वी रेलवे पर स्थित है, और वर्तमान में रेलवे स्टेशन को त्रिशबिघा कहा जाता है। उन दिनों वहाँ सरस्वती के नाम से एक बड़ी नदी थी, और वर्तमान त्रिशबिघा एक महान बंदरगाह है। १५९२ में, पाठानों ने आक्रमण किया, और १६३२ में सरस्वती नदी की बाढ़ के कारण, यह महान बंदरगाह आंशिक रूप से नष्ट हो गया। ऐसा कहा जाता है कि सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में, पुर्तगाली व्यापारी अपने जहाजों पर आया करते थे। उन दिनों, बंगाल के दक्षिणी तरफ स्थित सप्तग्राम बहुत समृद्ध और लोकप्रिय था। व्यापारी, जो प्रमुख निवासी थे, उन्हें सप्तग्राम सुवर्ण-वणिक कहा जाता था। वहाँ बहुत से धनी लोग थे, और हिराण्य मजुमदार और गोवर्धन मजुमदार कायस्थ समुदाय के थे। वे भी बहुत धनी थे, इतना कि इस छंद में उल्लेख किया गया है कि जमींदारों के रूप में उनकी वार्षिक आय 1,200,000 रुपये थी। इस संबंध में, कोई आदि-लीला (अध्याय ग्यारह, छंद 41) का उल्लेख कर सकता है, जो उद्धरण दत्त का वर्णन करता है, जो सप्तग्रामी सुवर्ण-वणिक समुदाय से भी संबंधित था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)