सप्तग्राम गाँव कलकत्ता से बर्दवान के लिए पूर्वी रेलवे पर स्थित है, और वर्तमान में रेलवे स्टेशन को त्रिशबिघा कहा जाता है। उन दिनों वहाँ सरस्वती के नाम से एक बड़ी नदी थी, और वर्तमान त्रिशबिघा एक महान बंदरगाह है। १५९२ में, पाठानों ने आक्रमण किया, और १६३२ में सरस्वती नदी की बाढ़ के कारण, यह महान बंदरगाह आंशिक रूप से नष्ट हो गया। ऐसा कहा जाता है कि सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में, पुर्तगाली व्यापारी अपने जहाजों पर आया करते थे। उन दिनों, बंगाल के दक्षिणी तरफ स्थित सप्तग्राम बहुत समृद्ध और लोकप्रिय था। व्यापारी, जो प्रमुख निवासी थे, उन्हें सप्तग्राम सुवर्ण-वणिक कहा जाता था। वहाँ बहुत से धनी लोग थे, और हिराण्य मजुमदार और गोवर्धन मजुमदार कायस्थ समुदाय के थे। वे भी बहुत धनी थे, इतना कि इस छंद में उल्लेख किया गया है कि जमींदारों के रूप में उनकी वार्षिक आय 1,200,000 रुपये थी। इस संबंध में, कोई आदि-लीला (अध्याय ग्यारह, छंद 41) का उल्लेख कर सकता है, जो उद्धरण दत्त का वर्णन करता है, जो सप्तग्रामी सुवर्ण-वणिक समुदाय से भी संबंधित था।
