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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 205
 
 
श्लोक  2.16.205 
एक - दिन प्रभु तथा करिया निवास ।
प्राते कुमारहट्ट आइला, - याहाँ श्रीनिवास ॥205॥
 
 
अनुवाद
भगवान राघव पंडित के यहाँ केवल एक दिन रुके। अगली सुबह वे कुमारहट्ट गए, जहाँ श्रीवास ठाकुर रहते थे।
 
Mahaprabhu stayed at Sri Raghava Pandit's house for only one day. The next morning he went to Kumarhatta, where Srivasa Thakura lived.
तात्पर्य
कुमारहट्टा का वर्तमान नाम हालीशहर है। श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा संन्यास लेने के बाद, श्रीवास ठाकुर उनसे विरह के कारण नवद्वीप छोड़कर हालीशहर में रहने चले गये।

कुमारहट्टा से श्री चैतन्य महाप्रभु कांचनपल्ली (कांचड़ापाड़ा के नाम से भी जाना जाता है) गये, जहाँ शिवानन्द सेन रहते थे। शिवानन्द के घर पर दो दिन रहने के बाद भगवान वासुदेव दत्ता के यहाँ गये। वहाँ से वे नवद्वीप के पश्चिमी किनारे पर विद्यानगर नामक गाँव गये। विद्यानगर से वे कुलिया-ग्राम गये और माधव दास के घर पर ठहरे। वे वहाँ एक सप्ताह रहे और देवानन्द और अन्य लोगों के अपराधों को क्षमा किया। कविराज गोस्वामी द्वारा शांतिपूराचार्य के नाम का उल्लेख किये जाने के कारण, कुछ लोग सोचते हैं कि कुलिया कांचड़ापाड़ा के पास का एक गाँव है। इस गलतफहमी के कारण, उन्होंने न्यू कुलियारा पाटा नामक एक और स्थान का आविष्कार किया। वास्तव में ऐसी कोई जगह मौजूद नहीं है। वासुदेव दत्ता के घर को छोड़कर, श्री चैतन्य महाप्रभु अद्वैत आचार्य के घर गये। वहाँ से वे नवद्वीप के पश्चिमी ओर, विद्यानगर गये और विद्या-वाचस्पति के घर पर ठहरे। ये विवरण चैतन्य-भागवत, चैतन्य-मंगल, चैतन्यचंद्रोदय-नाटक और चैतन्य-चरित-काव्य में दिए गए हैं। श्रील कविराज गोस्वामी ने इस पूरे दौरे का स्पष्ट वर्णन नहीं किया है; इसलिए, चैतन्य-चरितामृत के आधार पर, कुछ बेईमान लोगों ने कांचड़ापाड़ा के पास कुलियारा पाटा नामक एक स्थान का आविष्कार किया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)