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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 137
 
 
श्लोक  2.16.137 
पण्डितेर गौराङ्ग - प्रेम बुझन ना याय ।
‘प्रतिज्ञा’, ‘श्री - कृष्ण - सेवा’ छाड़िल तृण - प्राय ॥137॥
 
 
अनुवाद
गदाधर पंडित और श्री चैतन्य महाप्रभु के बीच के प्रेमपूर्ण आत्मीयता को कोई नहीं समझ सकता। गदाधर पंडित ने गोपीनाथ की सेवा और व्रत का त्याग उसी प्रकार किया जैसे कोई तिनके का एक टुकड़ा त्याग देता है।
 
No one can understand the intimacy of the love between Gadadhara Pandita and Sri Chaitanya Mahaprabhu. Gadadhara Pandita abandoned his vow and service to Gopinatha just as one would abandon a piece of straw.
तात्पर्य
बस श्री चैतन्य महाप्रभु के संग के लिए गदाधर पंडित ने गोपीनाथ की सेवा के अपने जीवन के व्रत को त्याग दिया। इस तरह के प्रेमपूर्ण लगाव को केवल बहुत ही गुप्त भक्त समझ सकते हैं। सामान्य तौर पर इसका अर्थ कोई भी नहीं समझ सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)