सेइ भिते हात दिया फल परशिला ।
कृष्ण - योग्य नहे, फल अपवित्र हैला ॥83॥
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अनुवाद
"दरवाजे के ऊपर छत को छूने के बाद, तुमने नारियलों को भी छू लिया है। अब वे कृष्ण को अर्पित करने योग्य नहीं हैं क्योंकि वे दूषित हो गए हैं।"
"You touched the coconuts by touching the ceiling above the door. Now they are no longer fit to be offered to Krishna, because they have become contaminated."
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि राघव पंडित कोई पागल व्यक्ति नहीं थे जो सफाई के जुनून से पीड़ित हो। वह सांसारिक दुनिया से संबंधित नहीं थे। निम्न चेतना में, वास्तव में भौतिक होने पर भी किसी चीज़ को आध्यात्मिक मानने को भौम इज्या-धर्माह (भौतिक पूजा-बुद्धि) कहा जाता है। राघव पंडित कृष्ण के शाश्वत सेवक थे, और उन्होंने जो कुछ भी देखा वह प्रभु की सेवा से संबंधित था। वह हमेशा इस विचार में लीन रहते थे कि कैसे वह हर चीज़ के साथ कृष्ण की सेवा कर सकते हैं। कभी-कभी नवोन्मेषी, निचले स्तर के भक्त, भौतिक शुद्धता और अशुद्धता के स्तर पर राघव पंडित की नकल करने की कोशिश करते हैं। ऐसी नकल से किसी को मदद नहीं मिलेगी। जैसा कि चैतन्य-चरितामृत (अंत्य-लीला 4.174) में बताया गया है, "भद्राभद्र-वस्तु-ज्ञान नाहिका 'प्राकृत'।" पारलौकिक स्तर पर कोई उच्च या निम्न, शुद्ध या अशुद्ध नहीं होता है। भौतिक स्तर पर, अच्छे और बुरे के बीच अंतर किया जाता है, लेकिन आध्यात्मिक स्तर पर सब कुछ एक ही गुण का होता है।
'द्वैत' भद्राभद्र-ज्ञान, सब — 'मनोधर्म'
'एइ भाल, एइ मंड', — एइ सब 'भ्रम'
"भौतिक दुनिया में, अच्छे और बुरे की अवधारणाएँ सभी मानसिक अटकलें हैं। इसलिए, 'यह अच्छा है और वह बुरा है' कहना सब एक गलती है।" (Cc. अंत्य 4.176)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥