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श्लोक 2.15.82  |
पण्डित कहे , - द्वारे लोक करे गतायाते ।
तार पद - धूलि उड़ि’ लागे उपर भिते ॥82॥ |
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| अनुवाद |
| राघव पंडित ने तब कहा, 'लोग हमेशा उस दरवाज़े से आते-जाते रहते हैं। उनके पैरों की धूल उड़कर छत को छूती है।' |
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| "Then Raghav Pandit said, 'People constantly come and go through this door. The dust from their feet flies and touches the ceiling. |
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