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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  2.15.41 
आचार्येरे आज्ञा दिल करिया सम्मान ।
‘आ - चण्डाल आदि कृष्ण - भक्ति दिओ दान’ ॥41॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने बड़े आदर के साथ अद्वैत आचार्य से अनुरोध किया, "कृष्णभावनामृत और कृष्ण भक्ति, निम्नतम मनुष्यों [चाण्डालों] को भी प्रदान करें।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu very respectfully prayed to Advaita Acharya, “Please give the consciousness of Krishna-bhakti to even the lowest of the low (chandalas) people.”
तात्पर्य
यह श्री चैतन्य महाप्रभु का सभी भक्तों को दिया हुआ आदेश है। कृष्ण-भक्ति, कृष्ण के प्रति समर्पण, सभी के लिए है, यहाँ तक कि नीच जाति के लोगों जैसे चंडालों के लिए भी। इस आदेश का पालन श्री अधैत और नित्यानंद प्रभु की शिष्य परंपरा में करते हुए सम्पूर्ण विश्व में भेदभाव रहित तरीके से कृष्ण चेतना का प्रसार करना चाहिए।

मनुष्यों की अलग-अलग श्रेणियाँ होती हैं, जो ब्राह्मण से शुरू होकर सबसे निचले चरण पर जाना जाता है, जिसे चांडाल कहते हैं। इस कलिकाल में ऊँचे या नीच स्थान पर कोई भी क्यों न हो, सभी को कृष्ण चेतना से प्रबुद्ध करने की आवश्यकता है। आज इसका सबसे अधिक अभाव है। आजकल प्रत्येक व्यक्ति भौतिक अस्तित्व की पीड़ा से तड़प रहा है। यहाँ तक कि अमेरिकी सीनेट के पदाधिकारियों में भी भौतिक अस्तित्व के सूक्ष्म कष्ट महसूस किये जा रहे हैं, इतने अधिक कि 30 अप्रैल, 1974 को आधिकारिक तौर पर प्रार्थना दिवस के रूप में घोषित किया गया था। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति कलियुग के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुए सूक्ष्म कष्टों को महसूस कर रहा है, जो मानव समाज में व्याप्त अवैध यौन संबंध, मांसाहार, जुआ और नशे की लत की वज़ह से है। अब यह समय है कि इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस के सदस्य विश्व भर में कृष्ण-भक्ति का प्रसार करे और उस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेश का पालन करें। भगवान ने सभी को गुरु बनने का आज्ञा दी है (चैतन्य चरितामृत मध्य 7.128): आमरा आज्ञाए गुरु हां तारा एई देस। प्रत्येक शहर और गाँव के सभी लोगों को श्री चैतन्य महाप्रभु के निर्देशों से प्रबुद्ध किया जाना चाहिए। कृष्ण चेतना सभी को बिना भेदभाव के वितरित की जानी चाहिए। इस प्रकार, संपूर्ण विश्व शांतिपूर्ण और सुखी होगा, और प्रत्येक व्यक्ति श्री चैतन्य महाप्रभु की महिमा करेगा, जैसा कि वे चाहते हैं।

चांडाल शब्द का वास्तव में अर्थ होता है कुत्ता खाने वाला, जिसे मनुष्य की सबसे नीची जाति समझा जाता है। श्री चैतन्य महाप्रभु के आशीर्वाद से चांडालों को भी कृष्ण चेतना से प्रबुद्ध किया जा सकता है। कृष्ण-भक्ति एक विशेष जाति का एकाधिकार नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा दिए इस महान दान को प्राप्त करने का अधिकार है। प्रत्येक व्यक्ति को इसे प्राप्त करने तथा सुखी होने का अवसर दिया जाना चाहिए।

इस पद में 'दान' शब्द का भी महत्वपूर्ण अर्थ है, जिसका अर्थ है "दान"। जो कोई भी कृष्ण चेतना का प्रसार करने में लगा हुआ है, वह एक उदार व्यक्ति है। पेशेवर लोग श्रीमद् भागवतम का पाठ करते हैं और धन के बदले में कृष्ण-भक्ति पर चर्चा करते हैं। वे ऐसी महान दिव्य संपत्ति को प्रत्येक और किसी को भी नहीं बाँट सकते। केवल शुद्ध भक्त ही, जिनका कृष्ण की सेवा के अलावा कोई और उद्देश्य नहीं है, ही दान के रूप में ऐसे अत्यधिक मूल्यवान आशीर्वाद दे सकते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)