श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 292
 
 
श्लोक  2.15.292 
एबे ‘वैष्णव’ हैल, तार गेल ‘अपराध’ ।
ताहार उपरे एबे करह प्रसाद ॥292॥
 
 
अनुवाद
"अब जब वह वैष्णव बन गया है, तो उसे कोई अपराध नहीं है। आप बिना किसी हिचकिचाहट के उस पर अपनी कृपा बरसा सकते हैं।"
 
"Now that he has become a Vaishnava, he is free from sin. You may now shower your blessings upon him without hesitation."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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