श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 287
 
 
श्लोक  2.15.287 
प्रभु कहे, - अमोघ शिशु, किबा तार दोष ।
केने उपवास कर, केने कर रोष ॥287॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने सार्वभौम को शांत करते हुए कहा, "आखिरकार, तुम्हारा दामाद अमोघ तो बालक है। तो उसका क्या दोष? तुम उपवास क्यों कर रहे हो और क्रोधित क्यों हो?"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu calmed Sarvabhauma by saying, "After all, your son-in-law Amogha is just a child. So what is his fault in this? Why are you fasting and getting angry?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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