श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 280
 
 
श्लोक  2.15.280 
प्रभुर चरणे धरि’ करये विनय ।
अपराध क्षम मोरे, प्रभु, दयामय ॥280॥
 
 
अनुवाद
तब अमोघ भगवान के चरण कमलों में गिर पड़ा और विनम्रतापूर्वक बोला, “हे दयालु प्रभु, कृपया मेरे अपराध को क्षमा करें।”
 
Amogha fell at the lotus feet of Mahaprabhu and said humbly, “O merciful Lord, please forgive my sin.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)