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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 270
 
 
श्लोक  2.15.270 
आयुः श्रियं यशो धर्मं लोकानाशिष एव च ।
हन्ति श्रेयांसि सर्वाणि पुंसो महदतिक्रमः ॥270॥
 
 
अनुवाद
'जब कोई व्यक्ति महात्माओं के साथ दुर्व्यवहार करता है, तो उसकी आयु, ऐश्वर्य, कीर्ति, धर्म, संपत्ति और सौभाग्य सभी नष्ट हो जाते हैं।'
 
“When a person misbehaves with great men, his age, wealth, fame, religion, money and good fortune all get destroyed.”
तात्पर्य
श्रीमद्-भागवतम् 10.4.46 में लिखा है कि शुकदेव गोस्वामी ने यह कथन महाराज परीक्षित से कहा था। यह उद्धरण कृष्ण की बहन (योगमाया) को मारने के प्रयास से संबंधित है, जो कृष्ण के जन्म से पहले माता यशोदा की बेटी के रूप में प्रकट हुई थीं। यह पुत्री योगमाया और कृष्ण एक साथ पैदा हुए थे, और वसुदेव ने योगमाया को कृष्ण से बदल दिया और योगमाया को वहाँ से ले गए। जब उसे मथुरा लाया गया और कंस ने उसे मारने का प्रयास किया, तो योगमाया उसके हाथों से फिसल गई। उसे मारा नहीं जा सका। फिर उसने कंस को उसके दुश्मन कृष्ण के जन्म के बारे में बताया। इससे कंस भ्रमित हो गया। और उसने अपने साथियों से परामर्श किया, जो सभी राक्षस थे। जब यह बड़ी साजिश हो रही थी, तब शुकदेव गोस्वामी ने यह श्लोक सुनाया था। उन्होंने बताया कि एक राक्षस अपने नापाक कार्यों के कारण अपना सब कुछ खो सकता है।

इस श्लोक में "महा-अतिक्रम" शब्द का अर्थ है, "भगवान विष्णु और उनके भक्तों से ईर्ष्या करना"। महा शब्द एक महान व्यक्तित्व, एक भक्त या स्वयं परमेश्वर भगवान को इंगित करता है। सदैव भगवान की सेवा में लगे रहने के कारण भक्त स्वयं परमेश्वर भगवान जितने ही महान हैं। भगवान कृष्ण ने भी भागवद-गीता (9.13) में महा शब्द की व्याख्या की है:

"हे पृथा के पुत्र! जो मोहित नहीं हैं, महात्मा लोग, वे दिव्य प्रकृति के संरक्षण में रहते हैं। वे पूर्ण रूप से भक्ति में लीन हैं क्योंकि वे मुझे परमेश्वर भगवान, मूल और अविनाशी के रूप में जानते हैं।"

भगवान और उनके भक्तों से ईर्ष्या करना राक्षस के लिए बिल्कुल भी शुभ नहीं है। ऐसी ईर्ष्या द्वारा, एक राक्षस हर उस चीज को खो देता है जिसे लाभकारी माना जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)