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श्री चैतन्य चरितामृत
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लीला 2: मध्य लीला
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अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना
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श्लोक 267
श्लोक
2.15.267
अमोघ मरेन - शुनि’ कहे भट्टाचार्य ।
सहाय हइया दैव कैल मोर कार्य ॥267॥
अनुवाद
जब भट्टाचार्य ने सुना कि अमोघ हैजा से मर रहा है, तो उन्होंने सोचा, "यह ईश्वर की कृपा है कि वह वही कर रहा है जो मैं करना चाहता हूँ।
When Bhattacharya heard that Amogha was dying of cholera, he thought, “It is God's grace that what I want to do is happening.”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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