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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 265
 
 
श्लोक  2.15.265 
पतिं च पतितं त्यजेत् ॥265॥
 
 
अनुवाद
“‘जब पति पतित हो जाए, तो उसके साथ अपना रिश्ता तोड़ देना चाहिए।’”
 
“If the husband becomes corrupt, then one should break off relations with him.”
तात्पर्य
यह स्मृति-शास्त्र का एक उद्धरण है। जैसा कि श्रीमद्-भागवतम (7.11.28) में कहा गया है:

सन्तुष्टालोपुला दक्ष धर्म-ज्ञा प्रिय-सत्य-वाक्

अप्रमत्ता शुचिः स्निग्धा पतिं त्व अपतितं भजेत्

''एक पत्नी जो संतुष्ट है, जो लालची नहीं है, जो निपुण है और धार्मिक सिद्धांतों को जानती है, जो प्रिय और सत्य बोलती है और भ्रमित नहीं होती है, और जो हमेशा स्वच्छ और स्नेही होती है, उसे अपने पति के प्रति बहुत समर्पित होना चाहिए यदि वह पतित नहीं है।''

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)