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श्लोक 2.15.248  |
एइ अन्ने तृप्त हय दश बार जन ।
एकेला सन्यासी करे एतेक भक्षण! ॥248॥ |
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| अनुवाद |
| "इतना भोजन दस-बारह आदमियों को तृप्त करने के लिए पर्याप्त है, परन्तु यह संन्यासी अकेला इतना खा रहा है!" |
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| “This much food can satisfy ten to twelve people, but this monk is eating so much alone.” |
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