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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 243
 
 
श्लोक  2.15.243 
तुमि त’ ईश्वर, मुञि क्षुद्र जीव छार ।
एक - ग्रास माधुकरी करह अङ्गीकार ॥243॥
 
 
अनुवाद
"आप भगवान हैं, जबकि मैं तो एक तुच्छ प्राणी हूँ। अतः कृपया मेरे घर से थोड़ा-सा भोजन ग्रहण करें।"
 
"Where are you, the Supreme Personality of Godhead, and where am I, a mere mortal? Therefore, please eat a small amount of food at my house."
तात्पर्य
सन्यासियों से अपेक्षा की जाती है कि वे प्रत्येक गृहस्थ से थोड़ा भोजन एकत्रित करें। यानी कि, उन्हें खाने के लिए जितना चाहिए उतना ही लेना चाहिए। इस प्रणाली को माधुकरी कहते हैं। माधुकरी शब्द माधुकर शब्द से आया है और इसका अर्थ है "मधु संग्रह करने वाली मधुमक्खियाँ"। मधुमक्खियाँ प्रत्येक फूल से थोड़ा-थोड़ा शहद इकट्ठा करती हैं, परन्तु शहद की यह छोटी-छोटी मात्रा एकत्रित होकर मधुकोष बन जाती है। सन्यासियों को प्रत्येक गृहस्थ से थोड़ा-थोड़ा इकट्ठा करना चाहिए और शरीर को बनाए रखने के लिए केवल आवश्यक मात्रा में ही खाना चाहिए। सन्यासी होने के कारण भगवान चैतन्य महाप्रभु सर्वभौम भट्टाचार्य के घर से थोड़ा भोजन संग्रह कर सकते थे और भट्टाचार्य का निवेदन भी यही था। अन्य अवसरों पर भगवान द्वारा ग्रहण किए गए भोजन की तुलना में भट्टाचार्य का भोज एक निवाला भी नहीं था। भट्टाचार्य भगवान को यही बताना चाहते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)