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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 169
 
 
श्लोक  2.15.169 
तुमि याँर हित वाञ्छ’, से हैल ‘वैष्णव’ ।
वैष्णवेर पाप कृष्ण दूर करे सब ॥169॥
 
 
अनुवाद
“जिसका भी कल्याण तुम चाहते हो, वह तुरन्त वैष्णव बन जाता है, और कृष्ण सभी वैष्णवों को उनके पिछले पाप कर्मों के फल से मुक्ति दिलाते हैं।
 
"Whoever you wish well immediately becomes a Vaishnava. And Krishna frees all Vaishnavas from their past sins.
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु ने यहाँ वसुदेव दत्त को सूचित किया कि चूँकि कृष्ण सर्वशक्तिमान हैं, वे सभी बद्ध आत्माओं को भौतिक अस्तित्व से तुरंत मुक्त कर सकते हैं। संक्षेप में, श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "आप सभी प्रकार के जीवित प्राणियों की मुक्ति बिना किसी भेदभाव के चाहते हैं। आप उनके सौभाग्य के लिए बहुत चिंतित हैं, और मैं कहता हूँ कि सिर्फ आपकी प्रार्थना से ब्रह्मांड के भीतर सभी जीवित प्राणियों को मुक्त किया जा सकता है। आपको उनके पाप कर्मों का बोझ भी नहीं उठाना है। इस प्रकार आपको उनके पापी जीवन के लिए कष्ट भोगने की आवश्यकता नहीं है। जो कोई भी आपकी करुणा प्राप्त करता है वह तुरंत एक वैष्णव बन जाता है, और कृष्ण सभी वैष्णवों को उनके पिछले पाप कर्मों के प्रतिक्रियाओं से मुक्त करते हैं।" कृष्ण ने भगवद गीता (18.66) में भी यह वादा किया है।

सर्व धर्मान् परित्यज्य माम एकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।

"सभी प्रकार के धर्मों को त्याग करो और बस मुझे शरण दो। मैं तुम्हें सभी पाप प्रतिक्रियाओं से मुक्त कर दूँगा। डरो मत।"

जैसे ही कोई कृष्ण के प्रति पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण करता है, वह एक वैष्णव बन जाता है। भगवद गीता के इस श्लोक में कृष्ण अपने भक्त को पापी जीवन के सभी प्रतिक्रियाओं से मुक्त करने का वादा करते हैं। यह एक तथ्य है कि एक पूर्ण रूप से समर्पित वैष्णव भौतिक संक्रमण की सीमा से पूरी तरह बाहर है। कहने का तात्पर्य यह है कि वह अपने पिछले पाप या पुण्य कर्मों के परिणामों का सामना नहीं करता है। जब तक कोई पापी जीवन से मुक्त नहीं हो जाता, वह वैष्णव नहीं बन सकता। दूसरे शब्दों में कहें तो यदि कोई वैष्णव है, तो उसका पापी जीवन निश्चित रूप से समाप्त हो जाता है। पद्म पुराण के अनुसार:

अप्रारब्ध फलं पापं कूटं बीजं फलोन्मुखम्।

क्रमेणैव प्रलीयेतं विष्णु भक्ति रतात्मनाम्।।

"पापी जीवन में पाप कर्मों के निष्क्रिय प्रतिक्रियाओं के विभिन्न चरण होते हैं। पापी प्रतिक्रियाएँ बस प्रभावी होने की प्रतीक्षा कर रही हो सकती हैं [फलोन्मुख], प्रतिक्रियाएँ अभी भी और अधिक निष्क्रिय हो सकती हैं [कूट], या प्रतिक्रियाएँ बीज जैसी स्थिति में हो सकती हैं [बीज]। किसी भी मामले में, सभी प्रकार की पाप प्रतिक्रियाओं को एक के बाद एक वशीभूत किया जाता है यदि कोई व्यक्ति भगवान विष्णु की भक्ति सेवा में संलग्न होता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)