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श्लोक 2.15.158  |
तबे वासुदेवे प्रभु करि’ आलिङ्गन ।
ताँर गुण कहे हञा सहस्र - वदन ॥158॥ |
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| अनुवाद |
| तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने वासुदेव दत्त को गले लगा लिया और उनकी महिमा का बखान इस प्रकार करने लगे मानो उनके हजार मुख हों। |
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| After this, Mahaprabhu embraced Vasudeva Datta and started describing his glory as if he had a thousand mouths. |
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