बाह्ये राज - वैद्य इँहो करे राज - सेवा ।
अन्तरे कृष्ण - प्रेम इँहार जानिबेक केबा ॥120॥
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अनुवाद
"मुकुंददास बाह्य रूप से राजकीय सेवा में लगे एक राजवैद्य प्रतीत होते हैं, किन्तु आंतरिक रूप से उनमें कृष्ण के प्रति गहरा प्रेम है। उनके प्रेम को कौन समझ सकता है?
"Outwardly, Mukunda Das appears to be a royal physician employed in a government job, but deep within him is a deep love for Krishna. Who can understand his love?
तात्पर्य
जब तक श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु तथ्य का खुलासा नहीं करते, कोई भी यह नहीं समझ सकता कि वास्तव में भगवान के महान भक्त कौन हैं जो उनकी सेवा में लगे हुए हैं। इसलिए चैतन्य चरितामृत (मध्य 23.39) में कहा गया है, ताँरा वाक्या, क्रिया, मुद्रा विज्ञेहा ना बुझया: सबसे पूर्ण और विद्वान विद्वान भी वैष्णव की गतिविधियों को नहीं समझ सकते। एक वैष्णव सरकारी सेवा या किसी व्यावसायिक व्यवसाय में लगा हो सकता है जिससे बाहरी तौर पर कोई उसकी स्थिति को न समझ सके। हालाँकि, आंतरिक रूप से, वह नित्य-सिद्ध वैष्णव हो सकता है - यानी शाश्वत रूप से मुक्त वैष्णव। बाह्य रूप से मुकुंद दास एक शाही चिकित्सक थे, लेकिन आंतरिक रूप से वे सबसे मुक्त परमहंस भक्त थे। श्री चैतन्य महाप्रभु यह बात अच्छी तरह से जानते थे, लेकिन आम लोग इसे समझ नहीं पाते थे, क्योंकि वैष्णव की गतिविधियों और योजनाओं को आम लोग समझ नहीं सकते। हालाँकि, श्री चैतन्य महाप्रभु और उनके प्रतिनिधि एक भक्त के बारे में सब कुछ समझते हैं, भले ही भक्त बाहरी रूप से एक साधारण गृहस्थ और पेशेवर व्यवसायी होने का ढोंग कर सकता हो।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥