Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 119
 
 
श्लोक  2.15.119 
भक्त - गणे कहे , - शुन मुकुन्देर प्रेम ।
निगूढ़ निर्मल प्रेम, येन दग्ध हेम ॥119॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने तब अपने सभी भक्तों को बताया, "कृपया मुकुंद के भगवान के प्रति प्रेम के बारे में सुनें। यह अत्यंत गहन और शुद्ध प्रेम है और इसकी तुलना केवल शुद्ध स्वर्ण से ही की जा सकती है।"
 
Then Mahaprabhu told all his devotees, “Please listen about Mukunda's love for God.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)