“अतएव याँर मुखे एक कृष्ण - नाम ।
सेइ त’ वैष्णव, करिह ताँहार सम्मान” ॥111॥
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अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अंततः सलाह दी, "जो हरे कृष्ण मंत्र का जप कर रहा है, वह वैष्णव माना जाता है; इसलिए तुम्हें उसे पूरा सम्मान देना चाहिए।"
Finally Sri Chaitanya Mahaprabhu preached, “The person who chants the Hare Krishna mantra is considered a Vaishnava, so you should respect him fully.”
तात्पर्य
अपने उपदेशामृत में, श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं: कृष्णेति यस्य गिरि तं मनसा दृयेत दीक्षा ति चेत प्रणतिभिश्च भजन्तम ईशम | एक उन्नत भक्त को उस व्यक्ति का आदर करना चाहिए जो एक प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु द्वारा दीक्षित किया गया है और जो हरे कृष्ण महामंत्र का नाम लेते हुए, पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ आध्यात्मिक गुरु के निर्देशों का पालन करते हुए, आध्यात्मिक मंच पर स्थित है। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं कि वैष्णवों की सेवा करना गृहस्थों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। एक वैष्णव को ठीक से दीक्षित किया गया है या नहीं, यह विचार का विषय नहीं है। एक वैष्णव दीक्षित तो किया जा सकता है मगर मायावादी दर्शन से प्रभावित भी हो सकता है, लेकिन जो व्यक्ति भगवान का पवित्र नाम निःस्वार्थ भाव से लेता है, वह ऐसा प्रभावित नहीं होता। एक अच्छी तरह से दीक्षित वैष्णव अपूर्ण हो सकता है, लेकिन जो व्यक्ति भगवान के पवित्र नाम का निस्वार्थ भाव से जप करता है वह पूर्ण रूप से सही होता है। यद्यपि वह दिखने में एक नौसिखिया हो सकता है, फिर भी उसे एक शुद्ध, निर्मल वैष्णव माना जाना चाहिए। गृहस्थ का कर्तव्य है कि वह इस तरह के निर्मल वैष्णवों का सम्मान करे। यह श्री चैतन्य महाप्रभु का निर्देश है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥