श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 104
 
 
श्लोक  2.15.104 
प्रभु कहेन, - ’कृष्ण - सेवा’, ‘वैष्णव - सेवन’ ।
‘निरन्तर कर कृष्ण - नाम - सङ्कीर्तन’ ॥104॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, "भगवान कृष्ण के पवित्र नाम का निरंतर जप करते रहो। जब भी संभव हो, उनकी और उनके भक्तों, वैष्णवों की सेवा करो।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu replied, “You should constantly chant the holy name of Krishna and serve Him and His devotee Vaishnavas whenever possible.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)