| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 2: मध्य लीला » अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन » श्लोक 87 |
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| | | | श्लोक 2.14.87  | शुष्क - तकर् - खलि खाइते जन्म गेल याँर ।
ताँरे लीलामृत पियाओ, - ए कृपा तोमार ॥87॥ | | | | | | | अनुवाद | | "तर्क उस सूखी खली के समान है जिसमें से सारा तेल निकाल लिया गया है। भट्टाचार्य ने अपना जीवन ऐसी ही सूखी खली खाकर बिताया, किन्तु अब आपने उन्हें दिव्य लीलाओं का अमृत पिलाया है। यह निस्संदेह आपकी उन पर महान कृपा है।" | | | | "Logic is like dry cake from which all the oil has been squeezed out. Bhattacharya spent his entire life eating such dry cake, but now you have given him the nectar of divine pastimes." | | ✨ ai-generated | | |
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