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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  2.14.46 
‘हरि - बोल’ बलि’ काङ्गाल प्रेमे भासि’ याय ।
ऐछन अद्भुत लीला करे गौरराय ॥46॥
 
 
अनुवाद
जैसे ही भिक्षुकों ने पवित्र नाम "हरिबोल" का जप किया, वे तुरंत भगवान के प्रेम में लीन हो गए। इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु ने अद्भुत लीलाएँ कीं।
 
As soon as the beggars chanted "Haribol," they all immediately became immersed in divine love. Thus, Sri Chaitanya Mahaprabhu performed wonderful pastimes.
तात्पर्य
ईश्वर के परमानंद प्रेम की भावना को महसूस करना विलक्षण मंच पर होने के बराबर है। यदि कोई स्वयं को उस दिव्य स्थिति में रख सकता है, तो वह अवश्य ही घर लौट जाएगा, वापस भगवद् धाम में। आध्यात्मिक संसार में कोई उच्च, मध्य या निम्न वर्ग नहीं हैं। इसकी पुष्टि ईशावास्योपनिषद (7) में की गई है:

यस्मिन् सर्वणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।

तत्र को मोहः कः शोक एकत्वं अनुपश्यतः॥

"जो सदैव सभी जीवों को आध्यात्मिक अंशों के रूप में देखता है, गुणात्मक रूप से ईश्वर के समान, वही वास्तविक ज्ञाता बनता है। फिर उसके लिए क्या भ्रम या चिंता हो सकती है?"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)