श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन  »  श्लोक 256
 
 
श्लोक  2.14.256 
चैतन्य गोसाञि र लीला - अनन्त, अपार ।
‘सहस्त्र - वदन’ यार नाहि पाय पार ॥256॥
 
 
अनुवाद
भगवान चैतन्य की लीलाएँ असीम एवं अनंत हैं। यहाँ तक कि सहस्रवदन भगवान शेष भी उनकी लीलाओं की सीमा तक नहीं पहुँच सकते।
 
The pastimes of Sri Chaitanya Mahaprabhu are endless and immense. Even the thousand-headed Shesha Naga cannot fathom His pastimes.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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