श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन  »  श्लोक 232
 
 
श्लोक  2.14.232 
व्रज - रस - गीत शुनि’ प्रेम उथलिल ।
पुरुषोत्तम - ग्राम प्रभु प्रेमे भासाइल ॥232॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार वृन्दावन के गीतों को सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु का परमानंद प्रेम जागृत हुआ। इस प्रकार उन्होंने पुरुषोत्तम जगन्नाथ पुरी को भगवद्प्रेम से सराबोर कर दिया।
 
Thus, listening to the songs of Vrindavan, Mahaprabhu's love was awakened. Thus, he filled Purushottam village, or Jagannath Puri, with divine love.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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