श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन  »  श्लोक 219
 
 
श्लोक  2.14.219 
वृन्दावने साहजिक ग्रे सम्पत्सिन्धु ।
द्वारका - वैकुण्ठ - सम्पत् - तार एक बिन्दु ॥219॥
 
 
अनुवाद
"वृन्दावन का प्राकृतिक ऐश्वर्य सागर के समान है। द्वारका और वैकुंठ का ऐश्वर्य एक बूँद के बराबर भी नहीं है।"
 
"The natural splendor of Vrindavan is like an ocean. The splendor of Dwaraka and Vaikuntha is not even a drop.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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