श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन  »  श्लोक 215
 
 
श्लोक  2.14.215 
नारद - प्रकृति श्रीवास करे परिहास ।
शुनि’ हासे महाप्रभुर यत निज - दास ॥215॥
 
 
अनुवाद
नारद मुनि की भाव-भंगिमाओं का आनंद ले रहे श्रीवास ठाकुर ने इस प्रकार विनोद किया। उनकी बात सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु के सभी सेवक मुस्कुराने लगे।
 
Srivasa Thakura, in the guise of Narada Muni, was joking in this way. Hearing this, all of Mahaprabhu's personal servants began to laugh.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)