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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.14.21 
प्रतापरुद्रेर भाग्य देखि’ भक्त - गणे ।
राजारे प्रशंसे सबे आनन्दित - मने ॥21॥
 
 
अनुवाद
राजा प्रतापरुद्र पर भगवान की विशेष कृपा देखकर भक्तों ने राजा के सौभाग्य की प्रशंसा की और उनके मन खुले और आनंदित हो गए।
 
Seeing the special grace of Mahaprabhu on King Prataparudra, all the devotees praised the king's fortune and their hearts were filled with joy.
तात्पर्य
यह एक शुद्ध वैष्णव की पहचान है। वह कभी किसी दूसरे भक्त को श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा और शक्ति प्राप्त करने पर ईर्ष्या नहीं करता है। एक शुद्ध वैष्णव किसी व्यक्ति को भक्तिपूर्ण सेवा में ऊँचा उठते हुए देखकर बहुत खुश होता है। दुर्भाग्य से, कई तथाकथित वैष्णव ऐसे भी हैं जो श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा किसी व्यक्ति को वास्तव में पहचाने जाने पर ईर्ष्या करने लगते हैं। यह एक तथ्य है कि प्रभु की विशेष कृपा प्राप्त किए बिना कोई भी चैतन्य महाप्रभु के संदेश का प्रचार नहीं कर सकता है। यह प्रत्येक वैष्णव जानता है। फिर भी कुछ ईर्ष्यालु लोग हैं जो इस कृष्ण भावना आंदोलन के विश्वव्यापी विस्तार को बर्दाश्त नहीं कर सकते। वे इस आंदोलन को फैलाने वाले प्रचारकों में कमियाँ निकालते हैं और श्री चैतन्य महाप्रभु के मिशन को पूरा करने में उनके द्वारा दी गई अतिउत्कृष्ट सेवा के लिए उनकी प्रशंसा नहीं करते।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)