| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 2: मध्य लीला » अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन » श्लोक 183 |
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| | | | श्लोक 2.14.183  | ‘विलासादि’ - भाव - भूषार कह त’ लक्षण ।
येइ भावे राधा हरे गोविन्देर मन ? ॥183॥ | | | | | | | अनुवाद | | श्री चैतन्य महाप्रभु ने तब स्वरूप दामोदर से पूछा, "कृपया श्रीमती राधारानी के शरीर को सुशोभित करने वाले आनंदमय आभूषणों के बारे में बताइए, जिनके द्वारा वह श्री गोविंद के मन को मोहित करती हैं।" | | | | Then Sri Chaitanya Mahaprabhu said to Swarup Damodara, “Please tell me about those ornaments of feelings that adorn the body of Srimati Radharani, with which she captivates the mind of Sri Govinda.” | | ✨ ai-generated | | |
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