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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन  »  श्लोक 167
 
 
श्लोक  2.14.167 
अष्ट ‘सात्त्विक’, हर्षादि व्यभिचारी’ याँर ।
‘सहज प्रे म’, विंशति ‘भाव’ - अलङ्कार ॥167॥
 
 
अनुवाद
“श्रीमती राधारानी के शरीर के दिव्य आभूषणों में आठ सात्विक या दिव्य लक्षण, तैंतीस व्यभिचारी भाव, जो हर्ष या स्वाभाविक प्रेम में उल्लास से शुरू होते हैं, और बीस भाव या आनंदमय भावनात्मक आभूषण शामिल हैं।
 
“The transcendental ornaments of Srimati Radharani's body include eight sattvika or divine sentiments, thirty-three vyabhichari sentiments like joy or blissful spontaneous love, and twenty sentimental ornaments.”
तात्पर्य
तेतीस व्याभिचारी भाव, उन्मादी प्रेम में प्रकट होने वाले शारीरिक लक्षण, इस प्रकार हैं: (१) निर्वेद, उदासीनता; (२) विषाद, उदासी; (३) दैन्य, नम्रता; (४) ग्लानि, ऐसा महसूस होना कि कोई गलत स्थिति में है; (५) श्रम, थकान; (६) मद, पागलपन; (७) गर्व, अभिमान; (८) शंका, संदेह; (९) त्रास, झटका; (१०) आवेग, तीव्र भावना; (११) उन्मद, पागलपन; (१२) अपस्मार, विस्मृति; (१३) व्याधि, बीमारी; (१४) मोह, भ्रम; (१५) मृति, मृत्यु; (१६) आलस्य, आलस्य; (१७) जाड्य, अमान्यता; (१८) व्रीडा, शर्म; (१९) अवहितथा, छुपाव; (२०) स्मृति, स्मरण; (२१) विंतर्क, तर्क; (२२) चिंता, चिंतन; (२३) मति, ध्यान; (२४) धृति, सहनशीलता; (२५) हर्ष, उल्लास; (२६) उत्सुक्य, उत्सुकता; (२७) औग्र्य, हिंसा; (२८) अमर्ष, क्रोध; (२९) असूया, ईर्ष्या; (३०) चापल्य, निर्लज्जता; (३१) निद्रा, नींद; (३२) सुप्ति, गहरी नींद, और (३३) प्रबोध, जागरण।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)