| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 2: मध्य लीला » अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन » श्लोक 162 |
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| | | | श्लोक 2.14.162  | वाम्य - स्वभावे मान उठे निरन्तर ।
तार मध्ये उठे कृष्णेर आनन्द - सागर ॥162॥ | | | | | | | अनुवाद | | “क्योंकि वह एक वाममार्गी गोपी है, उसका स्त्रीवत क्रोध सदैव जागृत रहता है, लेकिन कृष्ण उसके कार्यों से दिव्य आनंद प्राप्त करते हैं। | | | | “Being a Vama Gopi, her feminine anger is always aroused, but Krishna derives divine pleasure from her activities. | | ✨ ai-generated | | |
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